कली खिली है
कही आस जगी है,
फाग आयी है,
रंग लायी है,
कली खिली है,
बहार आयी है..
मुझे पैसो डर लगता है ,
कहीँ हवा मे उड़ने लगूँ,
धरती से,
और फिर बिखरने लगूँ
अंदर से,
मुझे इतने पैसो से भीति है,
कहीँ संभल न पाएं
गिरने लगे,
उठाने के लिए तो होंगे,
पर जगाने के लिए ?
मुझे ऐसे धन से दहशत है,
चकाचोंध में खोने लगे
चारो और से
फिर भी सब अच्छा लगे
जुठ सच लगे,
और अँधेरा रोशन लगे
मुझे पैसो ...
जो लक्ष्मी नहीं है
वो सही नहीं है,
जो किसी की नहीं है,
जो सही समय पर काम की नहीं,
मुझे उस दौलत से डर है
लत लगा दे
अपना आप गवा दे
रिश्ते बिखरा दे
मति बिगाड़ दे
कलेश बिठा दे,
गति रुका दे,
देर से ... ही
शर्म से ज़ुका दे
मुझे ऐसे रूपों से खौफ है
अहंकार से अँधकार तक
दशा दिखाए
मद से भटकाए,
अपने असल से मिलवाये
मुझे ऐसे पैसों से, उतने पैसो से डर है. .. .....
तिरस्कार लगे फटकार
मानवी मानवी पर बरसाए बार बार
लगातार अनरधार अपरंपार
सोचते रह जाते है किस घोड़ी पे है सवार,
कर देते है ये वार
लिए - पहनाये काटों का हार
शायद बहार आ रहा है,
अंदर का बवाल
दिल में कहीं रहा गया होगा सवाल,
जिसका ढूँढ रहे है वो जवाब!
लेकिन
तरीका है बेकार,
मौका तो दे उनको भी मेरे यार,
क्यों ना करे थोड़ा सा,
सिर्फ १०० ग्राम सा...
सोच विचार!
नज़रये की है बात,
रख ले थोड़ा सा ऐतबार,
कदाचित नज़रिए पे आ जाये प्यार
तिरस्कार है वार
सुःख, शांति, खुशियों पे मार,
ना करे ख़ुद पे अत्याचार,
छोड़े थोड़ा सा अवकाश
नज़रिए की है बात
रखें दिल साफ़
तिरस्कार है अत्याचार!